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भारतीय संविधान के अधिकार

भारतीय संविधान के अधिकार

विश्व के अधिकांश दूसरे लोकतंत्र की तरह भारत में भी अधिकार संविधान में दर्ज है हमारे जीवन के लिए बुनियादी रूप से जरूरी अधिकारों को विशेष दर्जा दिया गया है इन्हें मौलिक अधिकार कहा जाता है यह सभी नागरिकों को समानता स्वतंत्रता और न्याय दिलाने की बात कहता है मौलिक अधिकार इन वायदों को व्यवहारिक रूप देते हैं यह अधिकार भारत के संविधान की एक महत्वपूर्ण बुनियादी विशेषता है आइए एक-एक करके सभी मौलिक अधिकारों के बारे में जानते हैं।


समानता का अधिकार

हमारा संविधान कहता है कि सरकार भारत में किसी व्यक्ति को कानून के सामने समानता या कानून से संरक्षण के मामले में समानता के अधिकार से वंचित नहीं कर सकती इसका मतलब यह हुआ कि किसी व्यक्ति का दर्जा या पद चाहे जो हो सब पर कानून समान रूप से लागू होता है इसे कानून का राज भी कहते हैं कानून का राज किसी भी लोकतंत्र की बुनियाद है इसका अर्थ हुआ कि कोई भी व्यक्ति कानून के ऊपर नहीं है किसी राजनेता सरकारी अधिकारी या सामान्य नागरिक में कोई अंतर नहीं किया जा सकता।


प्रधानमंत्री हो या दूर-दराज के गांव का कोई खेतिहर मजदूर सब पर एक ही कानून लागू होता है कोई भी व्यक्ति वैधानिक रूप से अपने पद या जन्म के आधार पर विशेषाधिकार या खास व्यवहार का दावा नहीं कर सकता जैसे कुछ साल पहले देश के एक पूर्व प्रधानमंत्री पर भी धोखाधड़ी का मुकदमा चला था सारे मामले पर गौर करने के बाद अदालत में उनको निर्दोष घोषित किया था लेकिन जब तक मामला चला उन्हें किसी अन्य आम नागरिक की तरह ही अदालत में जाना पड़ा अपने पक्ष में सबूत देने पड़े कागजात दाखिल करने पड़े।


स्वतंत्रता का अधिकार

स्वतंत्रता का मतलब बाधाओं का न होना है जीवन में इसका मतलब होता है हमारे मामलों में किसी किस्म का दखल न होना, न सरकार का, न व्यक्तियों का। हम समाज में रहना चाहते हैं लेकिन हम स्वतंत्रता भी चाहते हैं हम मनचाहे ढंग से काम करना चाहते हैं कोई हमें यह आदेश न दें कि इसे ऐसे करो वैसे करो इसलिए भारतीय संविधान में प्रत्येक नागरिक को कई तरह की स्वतंत्रता दी हैं।


अपनी स्वतंत्रता का ऐसा उपयोग नहीं कर सकते जिससे दूसरों की स्वतंत्रता का हनन होता हो आपकी स्वतंत्रता सार्वजनिक परेशानी या अव्यवस्था पैदा नहीं कर सकती आप वह सब करने के लिए आजाद हैं जिससे दूसरों को परेशानी ना हो।


शोषण के खिलाफ अधिकार

स्वतंत्रता और बराबरी का अधिकार मिल जाने के बाद स्वभाविक है कि नागरिक को यह अधिकार भी हो की कोई उसका शोषण ना कर सके हमारे संविधान निर्माताओं ने इसे भी संविधान में लिखित रूप से दर्ज करने का फैसला किया ताकि कमजोर वर्गों का शोषण ना हो सके। संविधान ने खासतौर से तीन बुराइयों का जिक्र किया है और इन्हें गैरकानूनी घोषित किया है।


पहला संविधान मनुष्य जाति के अवैध व्यापार का निषेध करता है आमतौर पर ऐसे धंधे का शिकार महिलाएं होती हैं जिनका अनैतिक कामों के लिए शोषण होता है


दूसरा हमारा संविधान किसी किस्म के जबरन काम लेने का निषेध करता है इस प्रथा में मजदूरों को अपने मालिक के लिए मुफ्त या बहुत थोड़े से अनाज या फिर किसी अन्य चीजों के लिए जबरन काम करना पड़ता है जब यही काम मजदूर को जीवन भर करना पड़ जाता है तो उसे बंधुआ मजदूर कहते हैं।


तीसरा संविधान बाल मजदूरी का भी निषेध करता है किसी कारखाने खदान या रेलवे और बंदरगाह जैसे खतरनाक काम में कोई भी 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चे से काम नहीं करा सकता इसी को आधार बनाकर बाल मजदूरी रोकने के लिए अनेक कानून बनाए गए हैं इसमें बीड़ी बनाने, पटाखे बनाने, दियासलाई बनाने, प्रिंटिंग और रंगरोगन जैसे कामों में बाल मजदूरी रोकने के कानून शामिल है।


धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार

स्वतंत्रता के अधिकार में धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार भी शामिल है विश्व के अन्य देशों के समान भारत के अधिकांश लोग अलग-अलग धर्म को मानते हैं कुछ लोग किसी भी धर्म को नहीं मानते धर्मनिरपेक्षता इस सोच पर आधारित है कि शासन का काम व्यक्तियों के बीच के मामलों को ही देखना है व्यक्ति और ईश्वर के बीज के मामलों को नहीं धर्मनिरपेक्ष शासन वह है जहां किसी भी धर्म को आधिकारिक धर्म की मान्यता नहीं होती भारतीय धर्मनिरपेक्षता में सभी धर्मों के प्रति शासन का समभाव रखना शामिल है धर्म के मामले में शासन को सभी धर्मों से उदासीन और निरपेक्ष होना चाहिए हर किसी को अपना धर्म मानने उस पर आचरण करने और उसका प्रचार करने का पूरा अधिकार है।


सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकार

संविधान अल्पसंख्यकों के सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकारों को स्पष्ट करता है।


नागरिकों में विशिष्ट भाषा या संस्कृति वाले किसी भी समूह को अपनी भाषा और संस्कृति को बचाने का अधिकार है।


किसी भी सरकारी या सरकारी अनुदान वाले शैक्षिक संस्थान में किसी नागरिक को धर्म या भाषा के आधार पर दाखिल लेने से नहीं रोका जा सकता।


सभी अल्पसंख्यकों को अपनी पसंद का शैक्षिक संस्थान स्थापित करने और चलाने का अधिकार है।


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