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सविनय अवज्ञा आंदोलन

सविनय अवज्ञा आंदोलन

1929 में लाहौर में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का वार्षिक सम्मेलन हुआ जिसमें संपूर्ण स्वराज की संकल्पना की घोषणा की गई और यह लक्ष्य स्वीकार कर लिया गया तथा 12 मार्च 1930 को गांधी जी ने राष्ट्रीय आंदोलन के नए चरण की घोषणा की।


नया आंदोलन जोकि सविनय अवज्ञा आंदोलन के नाम से जाना जाता है इसे गांधी जी ने अपने 78 समर्थकों के साथ ऐतिहासिक दांडी मार्च से आरंभ किया उन्होंने साबरमती आश्रम से दांडी तक पैदल यात्रा की और गुजरात में समुद्र तटीय गांव में नमक बनाकर या उठाकर कानून का बहिष्कार किया। औपनिवेशिक सरकार ने नमक बनाने पर प्रतिबंध लगा रखा था, इसलिए गांधी जी और उनके सहयोगियों द्वारा नमक बनाने पर उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।


लाखो लोग घरों से बाहर निकलकर गलियों में आ गए और धरना व प्रदर्शन करने लगे सभी ओर हड़ताले हो गयी थीं विदेशी वस्तुओं को बेचने वाली दुकानों पर धरना देना आरंभ किया गया और खादी और चरखे को प्रोत्साहन देने के लिए सब सूत कातने का कार्य आरंभ कर दिये। सैकड़ो लोगो ने अपने कार्यो को छोड़ दिया बम्बई में विशेष कर सोलापुर और अन्य औद्योगिक केन्द्रों में मजदूरों ने व्यापक हड़ताल की और विशाल प्रदर्शन किए कुछ क्षेत्रों में किसानों ने राजस्व का भुगतान करना बंद कर दिया।


लोगों की भावनाओं और उनके विरोध को देखते हुए ब्रिटिश सरकार ने महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा के लिए गोलमेज सम्मेलन में कांग्रेस को आमंत्रित किया अनेक कांग्रेश के नेताओं और कार्यकर्ताओं के विरोध के बावजूद भी गांधीजी इस सम्मेलन में भाग लेने को तैयार हो गए और सभी आंदोलनों को बंद करने के निर्देश दे दिए और उन्होंने इस समझौते पर हस्ताक्षर कर दीए जिसे गांधी इरविन पैक्ट के नाम से जाना जाता है और गोलमेज सम्मेलन असफल रहा क्योंकि ब्रिटिश सरकार ने कांग्रेश की मांगों को मानने से इनकार कर दिया सविनय अवज्ञा आंदोलन फिर से आरंभ हो गया था


किंतु इस समय वह अधिक प्रभावित नहीं रहा और अपने आप ही समाप्त हो गया सरकार ने आंदोलनों को अब और अधिक बलपूर्वक दबाने का कार्य आरंभ कर दिया लगभग एक लाख कांग्रेसी कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर लिया गया और प्रदर्शनों पर प्रतिबंध लगा दिया गया राष्ट्रवादी साहित्य पर पाबंदी लगा दी गई और राष्ट्रवादी प्रेस का दमन कर दिया गया मई 1934 में कांग्रेस ने अपना आंदोलन वापस ले लिया।


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